"जब-जब देश पर संकट आया है, तब-तब इस भारत भूमि ने ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति से इतिहास रचा है। रबारी समाज का ऐसा ही एक अमर शूरवीर था— रणछोड़भाई सवाभाई रबारी।"
भारत-पाक सीमा पर स्थित BSF की "रणछोड़ पोस्ट" आज भी उनके अद्वितीय साहस और राष्ट्रसेवा की अमर गाथा सुनाती है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
रणछोड़भाई सवाभाई रबारी का जन्म पेथापुर गथड़ो गाँव में हुआ था। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद उनका गाँव पाकिस्तान में चला गया, जहाँ वह आज भी स्थित है।
विभाजन के बाद रणछोड़भाई अपने ऊँटों और भेड़ों के साथ भारत आ गए और गुजरात के बनासकांठा जिले में बस गए। पशुपालन उनका व्यवसाय था, लेकिन मातृभूमि के प्रति प्रेम उनके जीवन का सबसे बड़ा धर्म था।
1965 का युद्ध और एक गुमनाम योद्धा
साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध की शुरुआत में पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र स्थित विधकोट चौकी पर कब्ज़ा कर लिया। इस संघर्ष में लगभग 100 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।
देश कठिन दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में सीमावर्ती क्षेत्र के हर रास्ते और हर पगडंडी से परिचित रणछोड़भाई सवाभाई रबारी भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए।
उन्होंने भारतीय सेना को न केवल सुरक्षित रास्ते दिखाए, बल्कि दुश्मन की गतिविधियों की सटीक जानकारी भी उपलब्ध कराई। अपने इस गुप्त अभियान की भनक उन्होंने किसी भी पाकिस्तानी सैनिक तक नहीं पहुँचने दी।
रणछोड़भाई रबारी के मार्गदर्शन की बदौलत भारतीय सेना मात्र ढाई दिनों में छारकोट पहुँच गई, जो उस समय एक बड़ी रणनीतिक सफलता थी।
1200 पाकिस्तानी सैनिकों की सूचना
रणछोड़भाई रबारी ऊँट पर सवार होकर पाकिस्तान में रह रहे अपने रिश्तेदारों और आसपास के ग्रामीणों से पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों की जानकारी जुटाते थे। उन्होंने लगभग 1200 पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती और गतिविधियों की गुप्त सूचना भारतीय सेना तक पहुँचाई।
इस महत्वपूर्ण जानकारी के कारण भारतीय सेना पर होने वाला एक बड़ा हमला समय रहते विफल कर दिया गया।
ऊँट बने भारतीय सेना की जीवनरेखा
रणछोड़भाई रबारी ने युद्ध के दौरान अपने ऊँटों के माध्यम से भारतीय सैनिकों तक गोला-बारूद, भोजन और आवश्यक सामग्री सुरक्षित एवं गुप्त रूप से पहुँचाई। दुश्मन को इसकी भनक तक नहीं लगी।
उनकी निस्वार्थ सेवा और भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस के परिणामस्वरूप भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को करारा जवाब दिया और विजय का परचम फहराया।
1971 के युद्ध में भी योगदान
1965 की तरह 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी रणछोड़भाई सवाभाई रबारी ने भारतीय सेना की हरसंभव सहायता की। सीमावर्ती क्षेत्रों की जानकारी, रसद पहुँचाने और रणनीतिक सहयोग के माध्यम से उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रसेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
अमर सम्मान
रणछोड़भाई सवाभाई रबारी के अद्वितीय योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने भारत-पाक सीमा पर स्थित BSF की एक सीमा चौकी का नाम "रणछोड़ पोस्ट" रखा।
यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस अदृश्य राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है जिसने बिना वर्दी पहने भी देश की रक्षा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
श्रद्धांजलि
रणछोड़भाई सवाभाई रबारी केवल रबारी समाज के गौरव नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए प्रेरणा हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति के लिए वर्दी नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण चाहिए।
ऐसे अमर राष्ट्रभक्त, भारत माता के वीर सपूत और रबारी समाज के गौरव रणछोड़भाई सवाभाई रबारी को शत-शत नमन।
